दोहे-1-10 / अर्जुन कवि

अर्जुन अनपढ़ आदमी, पढ्यौ न काहू ज्ञान ।
मैंने तो दुनिया पढ़ी, जन-मन लिखूँ निदान ।।

ना कोऊ मानव बुरौ, ब्रासत लाख बलाय।
जो हिन्दू ईसा मियाँ, भेद अनेक दिखाय ।।

बस्यौ आदमी में नहीं, ब्रासत में सैतान ।
अर्जुन सब मिल मारिये, बचै जगत इन्सान ।।

कुदरत की कारीगरी, चलता सकल जहान ।
सब दुनिया वा की बनी, को का करै बखान।।

रोटी तू छोटी नहीं, तो से बड़ौ न कोय ।
राम नाम तो में बिकै, छोड़ैं सन्त न तोय ।।

हिन्दू तौ हिन्दू जनै, मुस्लिम मुस्लिम जान ।
ना कोऊ मानव जनै, है गौ बाँझ जहान ।।

राज मजब विद्या धनै, घिस गे चारों बाँट ।
मनख न पूरा तुल सका, एक-एक से आँट ।।

राज मजब विद्या धनै, ऊँचे बेईमान ।
भोजन वस्त्र मकान दे, पद नीचौ ईमान ।।

राजा सिंह समान है, चीता मजहब ज्ञान ।
धन बिल्ली-सा छल करै, विद्या बन्दर जान ।।

प्राणदान शक्ती रखै, अर्जुन एक किसान ।
राज मजब विद्या धनै, हैं सब धूरि समान ।।

उत्पादक की साख है, जग पहचान हजार।
चन्दा पै ते दीखती, खड़ी चीन दीवार।।

पंच-तत्व को बाप है, सिरम तत्व पिरधान।
या के बिन वे ना फलैं, भूखों मरै जहान।।

नाम नासतिक धरि दियौ, जिनकूँ सच्चो ज्ञान।
पाखण्डै मानैं नहीं, कुदरत है भगवान।।

अर्जुन बुल बुल का करै, परे पिछारी काग।
ऊपर दुश्मन बाज है, नीचे बैरी नाग।।

मन्दिर मस्जिद आपके, हैं कैसे भगवान।
पण्डित मुल्ला नित लड़ें, अपने-अपने मान।।

आजादी आंधी चली, हवा दीन तक नाँय।
दिन सूरज की धूप में, राति राति में जाय।।

अर्जुन भारत राज में, उड़ै मंतरी मोर।
कंचन पंख समेटते, घोटाले घनघोर।।

कुदरत नैं धरती रची, लिखा न हिन्दुस्तान।
ना अमरीका, रूस है, ना ही पाकिस्तान।।

तू पौधा कब ते भई, अमरबेल विष बेल।
धरती तक देखी नहीं, अमृत पियै सकेल।।

उडि़ गये हंसा देश के, आजादी दिलवाय।
रह गये बगुला तीर पै, राज तिलक करवाय।।

लाखन साधुन में कहीं, मिलै न काबिल एक।
उत्पादक सब काबिलै, दे फल पेड़ हरेक।।