भाषा व्यवस्था और भाषा व्यवहार में अंतर तथा भाषा की संरचना का विवेचन

नमस्कार दोस्तों ! आज के इस आर्टिकल में हम आपको भाषा व्यवस्था और भाषा व्यवहार के बारे में बताने जा रहे है। किसी भी भाषा में परांगत होने के लिए उस भाषा की व्यवस्था और उसके व्यवहार के बारे पता होना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए यदि आप हिंदी भाषा को अच्छे से सीखना चाहते है तो इस आर्टिकल को अच्छे से पढ़े।

भाषा व्यवस्था और भाषा व्यवहार

भाषा व्यवस्था और भाषा व्यवहार में पर्याप्त अंतर है। भाषा व्यवस्था सार्वभौम, अमूर्त और सनातन है। इसका अभिप्राय यह है कि सैद्धांतिक अवधारणा में विश्व की सभी भाषाएँ आ जाती हैं, दूसरा भाषा व्यक्ति सापेक्ष न होकर समाज सापेक्ष है, किन्तु भाषा व्यवहार व्यक्तिगत है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी उच्चारण क्षमता, मानसिकता तथा वातावरण के अनुसार ही भाषा का प्रयोग करता है। हम यह पहले कह चुके हैं कि भाषा व्यवस्था अमूर्त और सनातन होती है अर्थात् वह अनश्वर है।

भाषा व्यवहार स्थूल और यथार्थ है। भाषा व्यवहार के अंतर्गत हम भाषा में स्वनियों और लेखिमों का प्रयोग करते हैं। भाषा व्यवस्था न तो स्वनियों में आबद्ध होती है न ही लेखिमों में। वह तो एक सूक्ष्म आदर्श रूप है। भाषा व्यवस्था स्थायी, सनातन, अनश्वर है, किन्तु भाषा व्यवहार अस्थायी, नश्वर है। विशेषकर भाषा का मौखिक रूप तो पूर्णतया नश्वर है। जैसे ही कोई वक्ता ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्यों का प्रयोग करता है, तो उसी समय ही उसकी ध्वनियाँ वायु में विलीन हो जाती हैं।

भाषा-व्यवस्था की सत्ता पूर्णतया मानसिक होती है, परन्तु भाषा-व्यवहार की सत्ता भौतिक । भाषा के उच्चरित और लिखित दोनों रूप प्रसिद्ध हैं। भाषा व्यवहार हमेशा वाक्य के रूप में ही प्रकट होता है और जब भाषा लिखी जाती है तो उसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। इसके विपरीत भाषा व्यवस्था भौतिक न होकर मानसिक होती है।

भाषा व्यवस्था और भाषा व्यवहार में ये सब अंतर होने पर भी हमें भाषा-व्यवहार से ही भाषा व्यवस्था का पता चलता है। दूसरी ओर, भाषा व्यवहार भाषा व्यवस्था पर आधारित है। अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि भाषा के ये दोनों रूप एक दूसरे पर आश्रित हैं। हम इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं। एक वक्ता विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन-अध्यापन तथा भाषा और साहित्य के संस्थानों में काम करके अपनी भाषिक क्षमता को बढ़ा सकते हैं, लेकिन ऐसा करने से उसके भाषा व्यवहार में भी उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता चला जाता है। अतः भाषा व्यवहार यदि भाषा व्यवस्था को समृद्ध करता है तो भाषा व्यवस्था भाषा व्यवहार को।

भाषा की संरचना का विवेचन

भाषा की संरचना का अर्थ है भाषा के निर्माण की प्रक्रिया अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि भाषा की संरचना से हमारा अभिप्राय उन तथ्यों से है, जो भाषा का निर्माण करते हैं। मानव की यह स्वाभाविक मनोवृत्ति है कि यह प्रत्येक विषय का गहन अध्ययन करता है।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में मानव ने जब गंभीर अध्ययन किया तो उसे पता चला कि पदार्थों की संरचना तत्वों से होती है, तत्वों की परमाणुओं से, परमाणुओं की इलेक्ट्रॉनों से ओर इलेक्ट्रॉनों की न्यूट्रॉनों से भाषा की संरचना भी कुछ तत्वों पर निर्भर है, लेकिन भाषा की संरचना जटिल है। विज्ञान के समान भाषा की संरचना के बारे में शत प्रतिशत सूचना नहीं दी जा सकती।

भाषा वैज्ञानिकों ने भाषा संरचना के छह स्तर स्वीकार किए हैं- ये हैं स्वन स्तर, स्वनिम स्तर, रूपिम स्तर, शब्द रूप स्तर तथा अर्थ स्तर । इनको मिलाकर पुनः चार स्तर बनाए जा सकते हैं- स्वन स्वर, शब्द स्तर, वाक्य स्तर, अर्थ स्तर। इसे हम एक वाक्य द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं।

“राम ने रावण को बाण से मारा।”

उपर्युक्त वाक्य में र् + आ + म् + आ आदि विभिन्न स्वन स्तर हैं। राम ने रावण, को “आदि शब्द स्तर हैं। पूरा वाक्य वाक्य स्तर कहलाएगा तथा इसका अर्थ ही अर्थ स्तर कहा जाएगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषा संरचना के चार अथवा छह तत्व हो सकते हैं।

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