दो बैलों की कथा कहानी सार/सारांश | Do Bailon Ki Katha Kahani

मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित ‘दो बैलों की कथा’ एक उत्कृष्ट कहानी है। प्रस्तुत कहानी में मानव तथा पशुओं के बीच सामंजस्य तथा असमंजस का बड़ा ही सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया गया है। भारतीय समाज में व्याप्त अकर्मण्यता पर भी लेखक ने करारा व्यंग्य किया है। कहानी का सार इस प्रकार है-

झूरी काछी के पास दो बैल थे। एक का नाम था हीरा और दूसरे का नाम मोती था। क्योंकि दोनों एक नाँद पर बाँधे जाते थे, तो दोनों में पक्की दोस्ती हो गयी थी। उन दोनों के दो शरीर थे, परंतु आत्मा दोनों की एक थी। एक दिन झूरी ने अपने दोनों बैलों को अपनी ससुराल भेज दिया। बैलों ने सोचा कि उनके मालिक ने उन्हें बेच दिया है। वे दोनों नाखुश थे। वे दोनों अपने मालिक के व्यवहार से अनभिज्ञ थे।

झूरी काछी के ससुराल से दोनों बिना कुछ खाए-पिए रात के अंधेरे में कड़े बंधन तोड़कर वापस अपने पुराने मालिक के घर लौट आए। झूरी उन्हें पाकर बहुत खुश हुआ; परंतु उसकी पत्नी को बैलों का यह रवैया बहुत बुरा लगा। उसने बैलों को हरी घास न डालकर उन्हें केवल सूखा भूसा ही डाला और अगले दिन उसका भाई ‘गया’ उनको फिर अपने घर ले गया। वह उनसे हल जोतना चाहता था, परंतु वे दोनों मार खाने के बाद भी पैर नहीं उठा रहे थे।

झूरी के साले भैरों की लड़की ने बैलों को दो रोटियाँ दीं। उन दोनों का क्रोध कुछ ठण्डा हुआ। अब वे दोनों दिनभर खेत जोतते, डण्डे खाते और थोड़ा-बहुत सूखा भूसा खाकर ही मन मसोस कर रह जाते। एक दिन जब लड़की उन पर हो रहे अत्याचार नहीं देख पायी तो उन्हें चुपके से आजाद कर दिया। रास्ते में उनका सामना एक साँड़ से हुआ।

लेखक के अनुसार, “दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके। साँड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था। वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्यों ही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौड़ाया। साँड़ उसकी तरफ मुड़ा, तो हीरा ने रगड़ा। साँड़ चाहता था कि एक-एक करके दोनों को गिरा ले; पर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे यह अवसर न देते थे। एक बार साँड़ झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला तो मोती ने बगल से आकर उसके पेट में सींग भोंक दी।

……. आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा ……. यहाँ तक कि साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा।”

साँड़ को हराकर वे दोनों भूखे-प्यासे बेखबर बेराह जा रहे थे। रास्ते में एक मटर के खेत को चरने लगे। उन्होंने भरपेट मटर खाई, परंतु उनमें से एक पकड़ा गया। दूसरा भी उसके साथ-साथ हो गया। आखिर दोनों को एक कॉजीहॉस में बंद कर दिया गया। वे वहाँ एक सप्ताह भूखे-प्यासे बंदी रहे। उन दोनों ने अपने साहस से दीवार तोड़ दी। सभी बंदी पशु आजाद होकर भाग गए। इसी कशमकश में मोती हीरा की रस्सी नहीं तोड़ पाया।

मोती पर खूब मार पड़ी और अगले दिन दोनों को एक कसाई के हाथों बेच दिया गया। दोनों कसाई के डर से काँप रहे थे। परंतु उन दोनों को ईश्वर की शक्ति में पूर्ण विश्वास था। रास्ते से गुजरते समय उन्हें एक परिचित रास्ते का एहसास हुआ। वे दोनों कसाई के हाथों से रस्सी छुड़वा कर भाग खड़े हुए रास्ता तय करके दोनों अपने पुराने मालिक झूरी काछी के घर पहुँचकर अपने स्थान पर खड़े हो गए। झूरी ने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक गले से लगा लिया। कसाई उनके पीछे-पीछे भागता हुआ उन्हें वापस लेने आया। मोती ने उसे अपने सीगों से मार-मारकर गाँव से बाहर निकाल दिया। दोनों को भरपेट खली-भूसा, चोकर दाना दिया गया। झूरी ने उन्हें खूब प्यार किया। उसकी पत्नी भी खुश थी और कहानी समाप्त हो जाती है।

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