कृष्ण भगत मीराबाई का जीवन परिचय | Meerabai Biography PDF in Hindi

मीराबाई का जीवन परिचय

मीराबाई का जीवन परिचय

राजस्थान के भक्तों में सर्वोपरि, भारत के प्रधान भक्तों में सम्माननीय और मध्ययुगीन हिंदी काव्य में विशिष्ट स्थान की अधिकारणी मीराबाई का सारा साहित्य कृष्ण भक्ति से संबंधित है। वह आँसुओं के जल से सींचा और आहों से सुवासित हुआ है। तत्कालीन अन्य कवियों के समान इनका जीवन वृत्त आज तक प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं हो पाया है। थोड़ी-सी ऐतिहासिक सामग्री तथा अन्य अंतर्साक्ष्यों और बहिर्साक्ष्यों के आधार पर मीरा के जीवन और व्यक्तित्व के स्थूल रूप से ही संतोष कर लेना पड़ता है।

मीरा का संबंध राठौड़ों की एक उपशाखा मेड़तिया वंश से था। राव दूदा जी के चौथे पुत्र रत्नसिंह की पुत्री मीराबाई थी। इनकी माता का नाम वीर कुमारी स्वीकार किया गया है। मीरा के जन्म के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। मिश्रबंधुओं ने इनका जन्म सं० 1573 माना, जिसका अनुसरण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया, पर वास्तव में यह मीरा के भोजराज से हुए विवाह का संवत् है। कहा जाता है कि वे प्रसिद्ध मैथिल कवि विद्यापति की समकालीन थी, पर ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर यह ठीक नहीं है।

इनके विषय में यह भी प्रसिद्ध है कि भक्तिन के रूप में प्रसिद्ध होकर ये महाराज अकबर और उनके नवरत्नों में से एक तानसेन से भी मिली थीं, पर प्रामाणिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कहा जाता है कि इन्होंने एक बार अपने जीवन की परिस्थितियों से घबरा कर तुलसीदास जी को पत्र लिखा था, जिसका उन्होंने उत्तर भी दिया था। इनका जन्म मेड़ता परगने के कुड़की नामक ग्राम में संवत् 1555 के आसपास हुआ था।

मीरा के दादा अत्यंत धर्मात्मा व्यक्ति थे, जिनके कारण इनके परिवार में धार्मिक भावनाओं की प्रधानता स्वाभाविक थी। इनमें भगवद्प्रेम के संस्कार बचपन से ही थे। बचपन से ही ये कृष्ण भक्त थीं।

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मीरा ने लौकिक सुहाग का सुख अधिक दिन नहीं देखा। विवाह के कुछ ही वर्षों बाद राणा सांगा के जीवन काल में ही इनके पति भोजराज की मृत्यु हो गई। इससे इनके जीवन में एक नया मोड़ आ गया। लेकिन सिंदूर लुट जाने पर गिरधर का अखंड सौभाग्य का रंग सदा के लिए उस पर छा गया। सभी राग-विरागों से मुक्त हो वह अपने आराध्य कृष्ण में ही एकनिष्ठ हो गई। उसका विरह कृष्ण-प्रेम का रूप ले गीतों में फूट पड़ा।

मीरा के श्वसुर उदार और स्नेही व्यक्ति थे अतः उनके रहते हुए मीरा को कोई कष्ट नहीं हुआ पर इनके देहांत के बाद मीरा को अनेक परेशानियां हुई उन्हें विषपान एवं पिटारी में सांप भेजकर मरवाने के प्रयास किये गये। कालांतर में ये पूर्ण वैरागिन होकर साधुओं की मंडली में मिल गई और वृंदावन चली गई। सं 1599 के आसपास वे द्वारिका धाम चली गईं और वहीं श्री रणछोड़ के मंदिर में कीर्तन भजन करते-करते अपनी आयु पूरी कर दी। इनकी मृत्यु के विषय में निश्चित रूप से कुछ ज्ञात नहीं। संवत् 1610 के आस-पास इन्होंने अपने काले बालों का सफ़ेद हो जाने का उल्लेख किया है-

दरद दीवानी भई बावरी डोली सब ही देस।
मीरा दासी भई है पडर पलटया काला केस।।

मीराबाई का संक्षिप्त जीवन परिचय

नाम मीराबाई
जन्म 1498 ई.
जन्म स्थान कुड़की ग्राम, मेड़ता : वर्तमान राजस्थान
माता का नाम वीर कुमारी
पिता का नाम रतनसिंह राठौड़
पति का नाम राणा भोजराज सिंह
संतान कोई संतान नहीं
पहचान महान कृष्ण भगत एवं प्रेमिका
मृत्यु 1547 ई.
मृत्यु स्थान रणछोड़ मंदिर डाकोर, द्वारिका (गुजरात)
जीवंत आयु 48 वर्ष

प्रमुख रचनाएँ

मीरा की रचनाएँ निम्नलिखित मानी जाती हैं:-

नरसी जी का महारों, गीत गोविंद की टीका, मीरा की गरबी, मीरा के पद, राग सोरठ के पद, रास गोबिंद। मीरा के फुटकर पद कोई 200 के लगभग मिले हैं। इनके पद गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली आदि में मिलते हैं। मीरा के सभी ग्रंथ उपलब्ध नहीं होते है। 

साहित्यिक प्रवृत्तियाँ

मीरा का सारा काव्य आँसुओं में डूबा हुआ है। यह सच्ची प्रेमिका है। इसकी भक्ति माधुर्य भाव की है वे सूर और तुलसी से इस क्षेत्र में आगे है। सूर ने गोपी राधा के माध्यम से कृष्ण की निकटता प्राप्त करने का प्रयास किया; तुलसी दास्य भाव की भक्ति के कारण मर्यादावादी रहे, पर मीरा तो स्वयं राधा बन गई है। उसके कृष्ण और उसमें किसी प्रकार छिपाव नहीं है।

प्रेम भावना

मीरा-काव्य का मूल स्वर प्रेम है। उनके प्रिय श्री कृष्ण हैं। मीरा ने उन्हें श्री गिरधर लाल, गिरधर गोपाल, नटवर नागर, नंदलाल, नंद-नंदन, बांके बिहारी, सांवरिया, गोविंद, प्रभु, पिया, प्रियतम, श्यामसुंदर आदि अनेक नामों से पुकारा है। उन्होंने संत और योगमत में प्रचलित शब्दों-जोगी, जोगिया, सतगुरु, साहब आदि से भी पुकारा है। मीरा का प्रेम, उनकी भक्ति सगुण लीलाधारी कृष्ण के प्रति निवेदित है। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ इसी की सहज अभिव्यक्ति है। मीरा के आराध्य वही कृष्ण हैं जिनके नयन विशाल हैं, जो मुरली और वैजयंती माला धारण करते हैं। माधुर्य भाव की अधिकता के कारण वह अपने प्यारे आराध्य को प्रातः जगाते हुए कहती है-

जागो बंसी बारे ललना, जागो मोरे प्यारे।
वह उनके रूप पर मुग्ध है—’या मोहन के मैं रूप लुभानी।।

कृष्ण उनके जीवन के आधार हैं। ‘हरि मेरे जीवन प्राणाधार’, ‘मैं गिरधर रंग राती’ तथा “मीरा लागो रंग हरी, और न रंग अरथ परी’ आदि उनकी प्रेम-भावना के परिचायक हैं। मीरा प्रियतम के चरणों में समर्पित हो, हर्ष विभोर नाच उठती हैं- पग घुंघरू बांध मीरा, नाची रे।

मैं तो मेरे नारायण की हो गई आपहि दासी रे।
लोग कहे मीरा भइ बावरी न्यात कहै कुल नासी रे ।।

कृष्ण का अवतारी रूप

मीरा ने कृष्ण के अवतारी और लोकोपकारक स्वरूप का चित्रण किया है, जिसमें जन्म-जन्मांतरों के आराध्य स्वामी से मीरा प्रार्थना करती है-

तुम सुरणो दयाल मांरी अरजी।
भवसागर में बही जात हूं काढ़ो तो थांरी मरजी।।

विरह-वेदना का आधिक्य

प्रेम और भक्ति चिरसंगी है और प्रेम के संयोग-वियोग पक्षों में विरह-वेदना की अनुभूति अधिक बलवती है। विरह प्रेम की एकमात्र कसौटी है। मीरा का सारा काव्य विरह की तीव्र वेदनानुभूति से परिपूर्ण है, पर इसमें रीतिकालीन विरह की तरह अस्वाभाविकता नहीं है। इसमें कहीं-कहीं अत्युक्तियाँ अवश्य है। इनके पदों की महत्वपूर्ण विशेषता मानसिक कष्टों का वर्णन है। कई पद तो इतने मार्मिक हैं कि हृदय को झकझोरने की क्षमता रखते हैं।

मीरा एक सच्ची प्रेमिका की भांति प्रियतम बात जोहती रहती है। प्रिय के आगमन के दिन गिनती रहती है। विरह ने मीरा का मन ‘पान के पत्ते’ की तरह पीला कर दिया है। उसका घायल मन व्याकुलता का परिचायक है—

नैन झर लावें।
कहा करू कित जाऊँ मोरी सजनी, वैदन कूंण बतावै।।

भक्ति का स्वरूप

मीरा की भक्ति अनेक पद्धतियों और सिद्धांतों की संयोग है। इन्होंने किसी भी संप्रदाय से दोक्षा नहीं ली थी। इन्हें अपनी भक्ति क्षेत्र में जो भी अच्छा लगा, इन्होंने उसे अपना लिया। मीरा पर सगुण और निर्गुण दोनों का प्रभाव है। मीरा ने निर्गुण भक्ति के अंतर्गत ईश्वर को नष्ट न होने वाला माना है-

“मीरा के प्रभु हरि अविनासी, देस्यूं प्राण अकोर।”

उन्होंने संतों के समान अपने आराध्य के गुणों का वर्णन किया है। उन्होंने दैन्यभाव को प्रधानता प्रदान की है-

छोड़ मत जाज्यो जी महाराज।
रूहा अबला बल म्हारों गिरधर, थे म्हारो सिरताज।।

मीरा की भक्ति में समर्पण भाव है। उनके काव्य में अनुभूति की गहनता है। इसलिए कई स्थानों पर उनकी माधुर्य भावना सूर तुलसी आदि से आगे बढ़ती दिखाई देती है।

रहस्योन्मुखी भावना

माधुर्य भाव की भक्ति करने के कारण मीरा और उनके प्रियतम कृष्ण में कोई दुराव छिपाव नहीं है। प्रेमानुभूति की गहराई की दृष्टि से मीरा सूफियों से भी अधिक सफल रही क्योंकि वह अल्हड़ प्रेमिका है और सूफ़ी मुख्यतः कवि थे। इनके पदों में प्रेमी-प्रेमिका में तनिक भी दूरी नहीं है, यहाँ अद्वैत भावना है –

तुम बिच हम बिच अंतर नाहिं, जैसे सूरजधामा।
मीरा के मन अवर न माने चाहे सुन्दर स्यामाँ ।।

गीति काव्य

मीरा के पदों में गेयता के सभी तत्व – आत्माभिव्यक्ति, संक्षिप्तता, तीव्रता, संगीतात्मकता, भावात्मक एकता और भावना की पूर्णता है। उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति व्यक्तिगत न होकर समष्टिगत है। सभी पद संगीत के शास्त्रीय पक्ष पर खरे उतरते हैं। इनके पदों का आकार संक्षिप्त है और इनमें भावों की पूर्णता भी है।

पायो जी मैं तो राम रतन धन पायो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस पायो ।।

भाषा शैली 

मीरा के काव्य में किसी एक भाषा का प्रयोग नहीं है। इसमें ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, हरियाणवी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रयोग है। परंतु राजस्थानी उनकी मुख्य भाषा रही है। इनके काव्य में भाव पक्ष को प्रमुखता दी गई है, इसलिए कला पक्ष अधिक मुखरित नहीं हो पाया।

इन्होंने भावानुकूल शब्दों का प्रयोग किया है, इनमें राजस्थानी के तद्भव और देशज शब्दों की संख्या बहुत अधिक है। भाषा में अलंकारों और छंदों का प्रयोग सहज रूप में हुआ है। शांत, भक्ति और करुण रसों के प्रयोग से काव्य में सरसता आ गई है। अनुभूति की गहनता और अभिव्यक्ति की प्रखरता के कारण मीरा का गीतिकाव्य आज भी सर्वोच्च स्थान रखता है।

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