रामलीला कहानी का सारांश/सार | Ramleela Kahani Summary in Hindi

रामलीला कहानी का सारांश

रामलीला कहानी का सारांश

कथाशिल्पी प्रेमचंद द्वारा रचित बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानियों में से ‘रामलीला’ एक बहुचर्चित कहानी है। अपने-आपको बड़ा समझने वालों के दोहरे व्यक्तित्व तथा कारगुजारियाँ बच्चों के मन-मस्तिष्क को किस प्रकार कुण्ठित करती हैं, यह सब रामलीला कहानी में उकेरा गया है। यह आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई कहानी है।

कहानी का सार इस प्रकार है :-

लेखक के अनुसार बनारस और रामनगर की रामलीलाएं बड़ी प्रसिद्ध हैं। दूर-दूर से लोग रामलीलाएं देखने आते हैं। लेखक को रामलीला देखे एक अरसा बीत गया है। हाँ, बचपन में देखी रामलीला और उससे जुड़ी यादें उन्हें अब भी स्मरण हैं। रामलीला की तैयारियों और दृश्य एवं स्थान लेखक के मस्तिष्क-पटल पर अभी तक जमे पड़े हैं। बचपन की ये अनुभूतियों लेखक को अभी भी आनन्दित कर देती हैं।

रामलीला स्थल लेखक के घर के निकट था, अतः यहाँ पहुँचकर लेखक अनेक छोटे-मोटे कार्य करके रामलीला आयोजन में सहायता करता रहता था। जब रामचन्द्र की सवारी निकलती तो वह रामचन्द्र के पीछे बैठकर गर्व से फूला नहीं समाता था। रामचन्द्र के पीछे बैठकर की गयी सवारी का रोमांच और आनन्द उन्हें आज भी रोमांचित कर देता है। निपाद-लीला वाले दिन के अनुभव को लेखक एक संस्मरण के माध्यम से सुनाते हुए लिखते हैं, “उस दिन मैं अपने मित्रों की बातों में आकर गिल्ली-डंडा खेलने में व्यस्त हो गया था। अचानक मुझे ध्यान आया तो मैं दौड़कर नदी किनारे पहुँचा। मल्लाह नाव को तट से अलग कर चुका था। 

रामचन्द्र की भूमिका करने वाला लड़का मेरे से बड़ी उम्र का था, पर वह मेरे से ही पढ़ा करता था। फिर भी वह मेरी श्रद्धा का केन्द्र था। परंतु आज रामचन्द्र की भूमिका में वह नाव पर बैठ गया और मेरी तरफ से उसने आँख फेर ली (हालांकि वह अपनी मर्जी से नहीं बैठा था बल्कि रामलीला के आयोजकों की मर्जी एवं रामलीला के दृश्य के अनुरूप जा रहा था।) अपनी उपेक्षा जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। प्रतिपल मेरी व्याकुलता बढ़ती गयी। मेरी हालत उस बछड़े की भाँति हो गयी, जो अपने कंधों पर जुआ रखे जाने के एहसास से घबरा कर छटपटाने लगता है। मैं कभी लपककर नाले की ओर जाता और कभी किसी सहायक की खोज में पीछे की तरफ दौड़ता, पर सब के सब अपनी धुन में मस्त थे मेरी चीख-पुकार किसी के कानों तक न पहुँची। मैंने जिन्दगी में अनेक विपत्तियाँ झेली पर उस समय जितना दुःख हुआ, उतना फिर कभी नहीं हुआ। मैंने भविष्य में रामचन्द्र बने लड़के के साथ न बोलने और न कुछ खाने के लिए देने का निश्चय किया। परंतु फिर नाव पुल की तरफ मुड़ी और मैं झट नाव पर कूद गया। मैं सभी दुःख भूलकर आनन्दित हो रहा था। 

रामलीला कहानी का सार

इस संस्मरण को सुनाने के बाद लेखक कहानी के मूल कथ्य पर आता है। रामलीला अब समाप्त हो गयी थी। आयोजक के पास पैसे की कमी और चन्दा कम मिलने के फलस्वरूप रामचन्द्र की गद्दी में देरी हो रही थी। लेखक (बचपन में) इस समय भी रामचन्द्र की देखभाल एवं सेवा करता रहा था। आखिर राजगद्दी का दिन आ ही गया। एक बड़ा-सा शामियाना ताना गया। इसी बीच वहाँ वेश्याओं के दल भी आ धमके। शाम को रामचन्द्र की सवारी की हर द्वार पर आरती उतारी गयी। लोगों ने श्रद्धानुसार रुपये-पैसे भी चढ़ाए। लेखक के पिता पुलिस वाले हैं, परंतु सब कुछ होने के बावजूद भी उनके पिता ने एक रुपया तक न दिया।

यह सोचकर लेखक का बाल-मन दुखी और रोष से भर गया। लेखक ने मामा द्वारा दिया गया तथा संभाल कर रखा गया एक रुपया रामचन्द्र को भेंट कर दिया। पिता ने लेखक को घूरते हुए देखा। रात के दस बज गए। इस प्रकार आरती की थाली में लगभग पाँच सौ रुपये जमा हो गए। परन्तु रामलीला के आयोजक चौधरी को रुपये कम लग रहे थे। चौधरी ने आबादी जान नामक युवा सुंदर वेश्या को पटाया कि वह अपने नाज-नखरों से लोगों की जेबों से रुपये निकलवाए, जितने रुपये बनेंगे दोनों आधा आधा बाँट लेंगे। आबादी जान का नाच हुआ और लोगों ने जी भर कर खूब रुपये लुटाए। मजे की बात तो यह थी कि लेखक के पुलिसिया पिता ने जोश में आकर आबादी जान को एक अशर्फी भेंट कर दी। यह सब दृश्य देखकर लेखक का बाल मन आहत, दुखी एवं पीड़ित हो उठा। वह वहाँ ठहर न सका। रात भर लेखक (बालक) को नींद नहीं आयी।

अगली सुबह रामचन्द्र तथा अन्य पात्रों को कुछ कपड़े रुपये देकर विदा करना था। परंतु आयोजक वेश्याओं की आवभगत में रमे हुए थे। किसी को भी इसकी चिन्ता न थी पात्रों को कपड़े तो दूर रहे उन्हें घर जाने का किराया तक न दिया गया। जब लेखक को पता चला तो उसका मन क्रोध से तिलमिला उठा। लेखक ने अपने पिता से दो रुपये माँगे ताकि वह पात्रों को किराए के लिए दे सके। लेखक के पिता ने साफ इंकार कर दिया। उस दिन से लेखक के मन से अपने पिता के प्रति श्रद्धा उठ गयी। चौधरी जैसे आयोजकों से भी चिढ़ हो गयी थी। बालक लेखक के पास दो आने शेष पड़े थे। झिझकते हुए वही दो आने लेखक ने रामचन्द्र बने पात्र को दिए और उसे आशातीत प्रसन्नता का अनुभव हुआ। दो आने लेकर राम, लक्ष्मण और सीता बने तीनों बालक विदा हो गए। कस्बे के बाहर तक उन्हें छोड़ने केवल लेखक के सिवा कोई नहीं गया।

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