सहर्ष स्वीकारा है प्रश्न-उत्तर / Saharsh Swikara Hai Question Answer

जैसा की आप सभी जानते है कि परीक्षा में अभ्यास के प्रश्न-उत्तर तो पूछे ही जाते है। इसलिए इस ब्लॉग पोस्ट में हमने सहर्ष स्वीकारा है प्रश्न-उत्तर की पूर्ण जानकारी साँझा कर दी है। ये सभी प्रश्न परीक्षा के सन्दर्भ में ही लिखें गए है। यदि आप इनको पढ़ लेते हैं तो इस कविता की आपकी पूरी तैयारी हो जाएगी। इसलिए आपको इन प्रश्नों को अवश्य पढ़ लेना चाहिए। इसके साथ ही साथ आप सहर्ष स्वीकारा है की सप्रसंग व्याख्या को भी पढ़ सकते हैं।

सहर्ष स्वीकारा है प्रश्न-उत्तर

प्रश्न1. गरबीली गरीबी ? टिप्पणी कीजिए। 

उत्तर- गरबीली गरीबी – गरबीली गरीबी से अभिप्राय है गर्वीली गरीबी अर्थात गर्वयुक्त दरिद्रता। गरीबी में मनुष्य हताश,निराश,दु:खी हो अपना धैर्य खो बैठता है। जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण सात्विक नहीं रहता लेकिन यहां कविता ने ऐसी गरीबी का चित्रण किया है जिसमें डूबकर वह हताश,निराश एवं दु:खी नहीं होता बल्कि धैर्य, साहस और स्वाभिमान से उसका मुकाबला करता है। वह इस गरीबी में जी कर भी खुश है, आनंदित है। उसे गरीब युक्त जीवन से कोई शोक या वेदना नहीं होती बल्कि वह गर्व से जीवन-यापन करता है इसलिए कवि ने गरीबी को गरबीली गरीबी कहा है। 

प्रश्न2. भीतर की सरिता ? टिप्पणी कीजिए। 

उत्तर- भीतर की सरिता – भीतर की सरिता है आंतरिक सरिता या हृदय रूपी सरिता। यहां कवि ने हृदय में  नदी का अभेद आरोपण किया है। जिस प्रकार नदी पवित्र होती है। उसका पानी पवित्र होता है। धाराएं पवित्र होते है,किनारे पवित्र होते हैं। जो नदी के साथ संबंधित है, यह सब कुछ पावन है उसी प्रकार हृदय भी पवित्र और उसमें उदित सभी भाव भी पवित्र हैं। जैसे सरिता के साथ मिलकर सब कुछ पवित्र बन जाता है उसी प्रकार कवि के भाव भी हृदय में आकार तथा उससे प्रवाहित होकर पवित्र बन जाते हैं। 

प्रश्न3. बहलाती सहलाती आत्मीयता ? टिप्पणी कीजिए। 

उत्तर- बहलाती,सहलाती आत्मीयता – बहलाती,सहलाती आत्मीयता अर्थात बहलाने,सहलाने वाला अपनापन। इस से अभिप्राय यह है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अतः समाज के साथ उसका अटूट संबंध है। समाज में मनुष्य के अनेक ऐसे-सगे संबंधी या चाहने वाले होते हैं जो दु:ख-सुख,राग विराग प्रत्येक स्थिति में उसको सहयोग देते हैं अर्थात सुख- दु:ख मैं मनुष्य के कुछ अपने लोग उसको धैर्य देते हैं इसलिए मनुष्य पर जब भी दु:ख पीड़ा या निराशा की घड़ी आती है तो उसके आत्मीय जन उसको दु:खों में बहलाते हैं, उसके दु:खों को सहलाने का प्रयास भी करते हैं। उन पर प्रेम रूपी मरहम भी लगाना चाहते हैं। यही वह आत्मीयता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में बहलाती और सहलाती  है। लेकिन प्रस्तुत कविता में कवि जीवन में इतना दु:खी और निराश हो चुका है कि उसे आत्मीय जन की बहलाती,सहलाती आत्मीयता भी सहन नहीं होती।

Saharsh Swikara Question Answer

प्रश्न4. ममता के बादल ? टिप्पणी कीजिए। 

उत्तर- ममता के बादल – ममता के बादल से अभिप्राय है ममता रूपी बादल या प्रेम के बादल। यहां कवि ने ममता पर बादलों का अभेद आरोप किया है।जिस प्रकार अपनी वर्षा से पृथ्वी को हरा-भरा कर देते हैं और चारों तरफ हरियाली फैलाकर सब को सुख प्रदान करते हैं उसी प्रकार प्रेम अपने भावों से प्रेमी जन को आनंद प्रदान कर आनंद विभोर कर देते हैं। लेकिन यहां कवि को प्रेम, खुशियां शायद अच्छी नहीं लगती इसलिए उन्हें ये ममता के बादलों की कोमलता भी पीड़ादायक प्रतीत होती है। 

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प्रश्न5. इस कविता में और भी टिप्पणी योग पद-प्रयोग है। ऐसे किसी एक प्रयोग का अपनी ओर से उल्लेख उस पर टिप्पणी करें।

उत्तर- मुसकाता चाँद – मुसकाता चाँद अर्थात मुस्कुराता हुआ चंद्रमा। इससे अभिप्राय यह है कि रात्रि के गहन अंधकार में जब चंद्रमा अपनी शीतल चांदनी लेकर उदित होता है तो वह चारों ओर व्याप्त अंधकार को मिटाकर अपनी उज्जवल चांदनी बिखरा देता है। रात्रि के गहन अंधकार पर फैला चंद्रमा मुस्कुराता हुआ प्रतीत होता है। इसलिए कवि ने मुस्काता चाँद कहा है। 

प्रश्न6. बहलाती सहलाती आत्मीयता बर्दाश्त नहीं होती है -और कविता के शीर्षक ‘सहर्ष स्वीकारा है’मैं आप कैसे अंतर्विरोध पाते हैं ? चर्चा कीजिए। 

उत्तर –प्रस्तुत कविता में कवि एक और तो कहता है कि मैंने सुख-दु:ख संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक, राग-विराग,आशा-निराशा आदि भावों को सहर्ष स्वीकारा किया है लेकिन दूसरी ओर उन्हें आत्मीय जन की बहलाती सहलाती आत्मीयता भी अच्छी नहीं लगती। यहां दोनों भाव एक-दूसरे के विपरीत दिखाई देते हैं लेकिन कभी ने अपने योवन काल में जब उनके शरीर में शक्त, विश्वास और स्वाभिमान होगा तब उन्होंने जीवन में आने वाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति का डटकर सामना किया होगा। उन्होंने राग विराग, सुख-दु:ख आशा-निराशा, संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक आदि भावों को सहर्ष अंगीकार किया हो।

लेकिन जब वे बुढ़ापे की ओर पदार्पण कर रहे होंगे या उनका आत्मविश्वास डगमगा गया होगा या शरीर में शक्ति नहीं होगी तो उन्हें लगा होगा कि उनके शरीर में अब इतनी भी शक्ति नहीं रही कि वे आत्मीय जन को बहलाती, सहलाती, आत्मीयता को भी सहन कर सकें। शायद आत्मिक शक्ति ना होने के कारण उनके जीवन पर ऐसी परिस्थितियां आई जीवन में अनुकूल-प्रतिकूल प्रत्येक भाव को सहर्ष स्वीकारा करने वाला व्यक्ति आत्मीय जन की सहानुभूति भी सहन नहीं कर सका तथा उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि अब आत्मीय जन की बहलाती,सहलाती आत्मीयता भी सहन नहीं होती। 

प्रश्न7. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर- ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता ‘गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित ‘भूरी-भूरी खाक धूल’संग्रह में संकलित है। इसमें कवि ने जीवन के सभी सुख-दु:ख हर्ष-विषाद, संघर्ष-अवसाद राग-विराग आदि के सम्यक-भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा दी है। मनुष्य को इन्हें खुशी-खुशी स्वीकार कर लेना चाहिए। इसके साथ-साथ यह कविता हमें उस विशिष्ट व्यक्ति या सत्ता की ओर भी संकेत करती है जिससे कवि को जीवन में प्रेरणा प्रदान की है। जिसकी प्रेरणा से उसने समस्त भावों को सहर्ष भाव से खुशी-खुशी स्वीकार किया है। 

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