ठाकुर का कुआँ कहानी का सारांश | Thakur ka Kuwa Kahani Saar

ठाकुर का कुआँ कहानी का सारांश

ठाकुर का कुआँ कहानी का सारांश

“ठाकुर का कुआँ’ मुंशी प्रेमचंद कृत एक यथार्थवादी कहानी है। प्रस्तुत कहानी में निम्न वर्गीय समाज की विडम्बनाओं को व्यक्त किया गया है। भारतीय समाज में जाति-पाँत के नाम पर उच्च वर्ग निम्नवर्गीय समाज को किस प्रकार मरने के लिए मजबूर करता है। इसी कड़वी सच्चाई को लेखक ने बड़े ही बेबाक अन्दाज में पेश किया है।

कहानी का सार इस प्रकार है :-

जोखू और गंगी निम्नवर्गीय दम्पति हैं। जोखू कई दिन से बीमार है। उसने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में बदबू आ रही थी। वह गंगी से कहता है कि यह कैसा पानी है। मारे बदबू के पिया ही नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा हुआ पानी पिलाए देती है। गंगी जिस कुएं से पानी भर कर लायी थी। उस कुएं में कोई जानवर गिरकर मर गया था जिससे पानी गंदा हो गया था, और पीने योग्य नहीं रह गया था। परंतु वह दूसरा पानी लाती कहाँ से? गाँव में दो कुएँ और ये एक साहूकार का और दूसरा ठाकुर का

परंतु निम्न जाति के लोगों को दोनों कुओं से पानी भरने की मनाही थी। गंगी जोखू के लिए इन्हीं कुओं से पानी लाना चाहती थी। परंतु जोखू उसे कहता है कि तुझे कोई भी अपने कुएं से पानी नहीं भरने देगा, उल्टा तू अपने हाथ पाँव तुड़वा आएगी। परंतु गंगी ने जोखू को यह बदबूदार पानी पीने के लिए नहीं दिया।

रात के नौ बजे थे। ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफिक्रे बैठे हुए थे। इस समय गंगी कुएं से पानी लाने पहुंची। अभी कुछ धुंधली रोशनी कुएं पर पड़ रही थी। गंगी वहीं बैठकर इंतजार करने लगी। इस कुएँ से सारा गाँव पानी पी सकता था, परंतु यही बदनसीब लोग नहीं पी सकते थे। गंगी बैठी-बैठी अपने नीच होने की बात विचारने लगी। अचानक किसी के आने की आहट हुई। गंगी की छाती धड़कने लगी। अगर किसी ने देख लिया तो खैर नहीं। एक लात मी नीचे न पड़ेगी। उसने घड़ा और रस्सी उठा ली और एक वृक्ष के साये में खड़ी हो गयी। उसे महंगू के मारे जाने की बात याद आ गयी क्योंकि उसने बेगार नहीं की थी, इसलिए ठाकुर के कारिन्दों ने उसे इतना मारा था कि वह महीनों लहू थूकता फिरा।

आहट उच्च जाति की दो महिलाओं की थी, जो पानी भरने के साथ पुरुष वर्ग द्वारा रोब जमाने का विरोध कर रही थीं। उनमें से एक कह रही थी-

“हम लोगों को बैठे देख जैसे मरदों को जलन होती है।”

दोनों पानी भर कर चली गयीं। गंगी वृक्ष के साये से निकलकर कुएँ से पानी भरने चढ़ी। बेफिक्रे अब चले गए थे। ठाकुर का दरवाजा बन्द हो गया था। उसने दाएँ-बाएँ देखकर घड़ा रस्सी से बांधकर कुएं में डाल दिया। घड़े ने पानी में गोता लगाया। उसने घड़े के डूबने की आवाज न होने दी। गंगी रस्सी जल्दी-जल्दी खींच रही थी। घड़ा कुएं के मुंह तक आ पहुंचा। वह घड़ा बाहर निकालने के लिए झुकी थी कि एकाएक ठाकुर का दरवाजा खुल गया।

भय से उसका मुख पीला पड़ गया। उसके हाथ से रस्सी छूट गयी। कुएं के मुंह तक आया घड़ा धड़ाम से वापस पानी में जा गिरा। कुछ क्षणों तक पानी के हिलोरें लेने की आवाज आती रही। ठाकुर “कौन है? कौन है ?” कहते कुएं की तरफ बढ़ रहे थे और गंगी कूदकर भागी जा रही थी। घर पहुंचकर गंगी ने देखा कि जोखू लोटा मुंह से लगाए वही मेला गन्दा पानी पी रहा था।

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